नई दिल्ली 6 जुलाई, 2026
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार हरमीत सिंह कालका ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए शहीद जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने की कड़े शब्दों में निंदा की। उन्होंने कहा कि इस फैसले से देश-विदेश के समूचे सिख समाज में भारी रोष और निराशा व्याप्त है।सरदार कालका ने कहा कि यह फिल्म पहले ‘पंजाब 95’ नाम से रिलीज़ होने वाली थी, लेकिन कई आपत्तियों के बाद इसका नाम बदलकर ‘सतलुज’ रखा गया। इसके बावजूद ओटीटी पर रिलीज़ होने के कुछ ही दिनों बाद इसे हटा दिया गया, जिससे कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उन्होंने कहा कि जब फिल्म से संबंधित सभी प्रक्रियाएं और आवश्यक अनुमतियां पूरी हो चुकी थीं, तो फिर इसे हटाने के पीछे क्या कारण हैं, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि शहीद जसवंत सिंह खालड़ा ने 1980 और 1990 के दशक के दौरान पंजाब में हुई हजारों कथित गैर-कानूनी हत्याओं और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कारों का पर्दाफाश कर ऐतिहासिक सच को दुनिया के सामने रखा था। उन्होंने कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा के शोध और प्रयासों के आधार पर अनेक पीड़ित परिवारों में न्याय की उम्मीद जगी तथा कई परिवारों को मुआवजा भी प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि ऐसे महान व्यक्तित्व के जीवन पर बनी फिल्म को लोगों की पहुंच से दूर करना ऐतिहासिक सत्य को दबाने का प्रयास माना जा रहा है।कालका ने कहा कि यह फिल्म किसी एक व्यक्ति या कलाकार की नहीं, बल्कि उस दौर के इतिहास की गवाही है जिसने पंजाब और सिख कौम को गहरे जख्म दिए। उन्होंने कहा कि ऐसी फिल्में नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ती हैं और उन्हें सत्य को समझने का अवसर प्रदान करती हैं। इसलिए इसे हटाना लोगों के जानने के अधिकार पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले को किसी कलाकार या अभिनेता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तविक मुद्दा शहीद जसवंत सिंह खालड़ा का जीवन, उनका सर्वोच्च बलिदान और उनके द्वारा उजागर किया गया ऐतिहासिक सत्य है। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि फिल्म को ओटीटी से हटाने के पीछे कोई तकनीकी कारण है या फिर किसी राजनीतिक दबाव के चलते यह निर्णय लिया गया है।दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष ने मांग की कि फिल्म को तत्काल पुनः ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया जाए तथा इसे हटाने के वास्तविक कारणों की जानकारी पूरी पारदर्शिता के साथ जनता के सामने रखी जाए। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक सत्य को दबाने का हर प्रयास लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भावना के विरुद्ध है तथा इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।









