लेखक अजेपाल सिंह बराड़
अध्यक्ष, मिसल सतलुज पार्टी
मोबाइल: 9872500244
पंथक जज़्बे से सराबोर, दरवेश स्वभाव के राजनीतिज्ञ, कथनी और करनी के धनी, निर्भीक, निष्पक्ष तथा पंथ–समर्पित व्यक्तित्व के स्वामी जत्थेदार मोहन सिंह तुड़ का जन्म वर्ष 1915 में जिला तरनतारन के गांव तुड़ में पिता जत्थेदार जगत सिंह नंबरदार तथा माता पाल कौर के घर हुआ।
सिख पंथ के लिए बलिदान की भावना उन्हें बचपन से ही परिवार से विरासत में मिली। उनके पिता ने जैतो मोर्चे का नेतृत्व किया था और अंग्रेजों का डटकर मुकाबला करते हुए गोली भी खाई, लेकिन अंततः विजयी होकर लौटे। युवावस्था में अपने पंथक समर्पण के कारण मोहन सिंह तुड़ को शिरोमणि अकाली दल के सरहाली सर्कल का जत्थेदार नियुक्त किया गया। उन्होंने पंजाबी सूबा आंदोलन में अत्यंत सक्रिय भूमिका निभाई।
उनकी बढ़ती लोकप्रियता से तत्कालीन कांग्रेस सरकार असहज हो गई। उनके विरुद्ध 52 मुकदमे दर्ज किए गए, उन्हें जेल भेजा गया तथा अमानवीय यातनाएं दी गईं। उन्हें बर्फ की सिलों पर लिटाकर प्रताड़ित किया गया। इसी दौरान शिरोमणि अकाली दल ने उन्हें तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के विरुद्ध विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया।
मतगणना में जत्थेदार मोहन सिंह तुड़ स्पष्ट बढ़त के साथ विजयी हो चुके थे, किंतु सत्ता के दबाव में प्रताप सिंह कैरों को 34 मतों से विजयी घोषित कर दिया गया। चुनाव के बाद कैरों सरकार ने उनके घर और संपत्ति की नीलामी भी करवाई, लेकिन वे अपने सिद्धांतों से कभी नहीं डिगे।
उनकी अडिग निष्ठा और पंथ–सेवा को देखते हुए सिख कौम ने उन्हें सिखों की सर्वोच्च संस्था श्री अकाल तख्त साहिब का जत्थेदार नियुक्त किया। वे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्य भी रहे।
उनकी पंथ–समर्पित सेवाओं को सम्मान देते हुए शिरोमणि अकाली दल के जनरल हाउस ने अक्टूबर 1972 में उन्हें पार्टी का अध्यक्ष चुना। अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने विभिन्न गुटों में बंटी पंथक शक्ति को एकजुट कर एक झंडे के नीचे संगठित किया। वर्ष 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के विरुद्ध उन्होंने संघर्ष का बिगुल फूंका। 19 महीनों के लंबे संघर्ष के बाद केंद्र सरकार को आपातकाल समाप्त करना पड़ा।
इस संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि देश में कांग्रेस विरोधी जनता पार्टी की सरकार बनी, जबकि पंजाब में जत्थेदार मोहन सिंह तुड़ के दूरदर्शी नेतृत्व में शिरोमणि अकाली दल और उसके सहयोगी दलों की संयुक्त सरकार अस्तित्व में आई। उनके नेतृत्व में शिरोमणि अकाली दल और सहयोगी दलों ने पंजाब की 13 लोकसभा सीटों पर विजय प्राप्त की।
उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं लोकसभा अध्यक्ष गुरदयाल सिंह ढिल्लों को तरनतारन लोकसभा क्षेत्र से पराजित कर स्वयं लोकसभा सदस्य बनने का गौरव प्राप्त किया। बाद में उन्होंने त्याग और संगठनात्मक मर्यादा की मिसाल पेश करते हुए शिरोमणि अकाली दल की अध्यक्षता स्वयं छोड़कर जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी को सौंप दी।
30 जुलाई 1979 को यह महान पंथक व्यक्तित्व इस नश्वर संसार को अलविदा कह गया। किंतु वे अपने परिवार और पंथ में सेवा, समर्पण और संघर्ष की ऐसी प्रेरणा छोड़ गए, जिसके मार्ग पर आज भी उनके परिवार के सदस्य पंथक संगठनों में सक्रिय रूप से सेवाएं निभा रहे हैं।
उनके सुपुत्र सरदार लहिणा सिंह तुड़ ने 1980 के लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल की ओर से विजय प्राप्त की। इसके बाद जत्थेदार तरलोचन सिंह तुड़ भी तीन बार लोकसभा सदस्य चुने गए। उनके दामाद जत्थेदार सुच्चा सिंह छोटेपुर पूर्व विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री के रूप में ईमानदारी से पंथ की सेवा करते रहे हैं। वहीं उनके वंशज अमरिंदर सिंह तुड़ वर्तमान में पंथक संगठन मिसल सतलुज को अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
जत्थेदार मोहन सिंह तुड़ को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि सिख कौम अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए एकजुट हो तथा पंजाब की वर्तमान चुनौतियों और पीड़ा का स्थायी समाधान खोजने के लिए संगठित प्रयास करे।
पंथ का दास:
अजेपाल सिंह बराड़
अध्यक्ष, मिसल सतलुज पार्टी
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