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रक्षाबंधन नारी अस्मिता,समानता,सुरक्षा और प्रेम की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है-ुउमेश शारदा

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ट्रिब्यून  टाइम्स  न्यूज

कपूरथला, 28 अगस्त 2026 :

 

 

भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और त्योहारों की भूमि पर रक्षाबंधन एक ऐसा पर्व है जो केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं,बल्कि संपूर्ण समाज में आत्मीयता,कर्तव्यबोध, और नैतिक मूल्यों के पुनर्संवेदन का पर्व है।यह बात भाजपा पंजाब के पूर्व प्रदेश सचिव व पूर्व चेयरमैन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट उमेश शारदा ने अपनी बहन रमा शर्मा से राखी बंधवाते हुए कही।इस अवसर पर उनके साथ  बेटियां समृद्धि,स्वाति और बहुएँ दिव्या वादिनी और कालिका भी उपस्थित थी।शारदा ने कहा यह पर्व नारी अस्मिता,समानता, सुरक्षा और प्रेम की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है।राखी का धागा जितना कोमल दिखता है,उतनी ही उसमें गहराई और दृढ़ता होती है,यह एक ऐसा लौकिक बंधन है,जो प्रेम,आदर्शों और जिम्मेदारियों से बंधा होता है।उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन कोई साधारण पर्व नहीं,यह आदर्शों का हिमालय है,संकल्पों का सोपान है।यह पर्व सिर्फ भाई-बहन के प्रेम की रस्म नहीं,बल्कि पुरुष समाज द्वारा नारी को आश्वस्त करने,उसका मान-सम्मान बनाए रखने की शपथ का दिन है।यह दिन हमें याद दिलाता है कि नारी केवल स्नेह की पात्र नहीं,वह शक्ति,श्रद्धा और समाज की दिशा तय करने वाली एक सशक्त प्रेरणा भी है।उन्होंने कहा कि आज जब महिलाएं समाज के हर क्षेत्र में बुलंदियों को छू रही हैं,सेना से लेकर विज्ञान,शिक्षा से लेकर खेल तक तब रक्षाबंधन उन्हें केवल भावनात्मक सुरक्षा नहीं,सामाजिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक सम्मान दिलाने का भी माध्यम बनता है।रक्षाबंधन की महत्ता को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक संदर्भों को जानना आवश्यक है।उन्होंने कहा कि भविष्य पुराण में उल्लिखित कथा के अनुसार जब देव-दानव युद्ध में दानव भारी पड़ने लगे,तब इंद्राणी ने अपने पति इन्द्र की रक्षा हेतु रेशम का धागा मंत्रों के साथ उनके हाथ पर बांधा, जिससे इंद्र विजयी हुए।मुगल काल में रानी कर्मवती ने जब चितौड़ पर संकट देखा,तो बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना की।हुमायूं ने धर्म,संप्रदाय और सत्ता से ऊपर उठकर उस धागे की लाज रखी और चितौड़ की रक्षा में अपनी ताकत झोंक दी।उन्होंने कहा कि महाभारत में जब भगवान श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त बहा,द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर पट्टी बांध दी।श्रीकृष्ण ने उस प्रेम को जीवन भर निभाया और चीरहरण के समय द्रोपदी की रक्षा की।यह केवल ऋण चुकता नहीं था,यह आदर्शों की प्रतिज्ञा थी।

 

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