नई दिल्ली 29 अगस्त,2026
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार हरमीत सिंह कालका और महासचिव सरदार जगदीप सिंह काहलों ने आज यहां एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान 1984 के सिख विरोधी नरसंहार के मुख्य आरोपी रहे सज्जन कुमार की शोक सभा में भाजपा के दिल्ली से तीन सांसदों द्वारा शिरकत करने की कड़े शब्दों में निंदा की।
सरदार हरमीत सिंह कालका ने कहा कि 1984 के नरसंहार के जख्म आज भी सिख कौम के दिलों में ताजा हैं। ऐसे व्यक्ति की शोक सभा में जनप्रतिनिधियों का शामिल होना सिख कौम की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाने वाली कार्रवाई है। उन्होंने कहा कि दिल्ली कमेटी इस कार्रवाई को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं कर सकती और इसकी पुरजोर निंदा करती है।
उन्होंने कहा कि इससे पहले जब कांग्रेस के सांसद भूपिंदर सिंह हुड्डा द्वारा सज्जन कुमार के संबंध में बयान दिया गया था तो दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इसका कड़ा विरोध किया था और रोष प्रदर्शन किया गया था, जिसके बाद उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी। यदि एक गलत बयान पर सिख कौम की भावनाओं का सम्मान करते हुए माफी मांगनी पड़ी थी तो 1984 के मुख्य आरोपी की शोक सभा में शामिल होने वाले सांसदों की कार्रवाई का भी कड़ा संज्ञान लिया जाना चाहिए।
सरदार कालका ने कहा कि भाजपा के पुराने नेतृत्व द्वारा 1984 के पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए किए गए प्रयासों को सिख कौम आज भी याद करती है। उन्होंने कहा कि स्वर्गीय अरुण जेटली और श्रीमती सुषमा स्वराज जैसे नेताओं ने 1984 के सिख पीड़ितों के लिए निकाले जाने वाले कैंडल मार्चों में सिखों के साथ खड़े होकर उनका साथ दिया। 1984 मेमोरियल के निर्माण के समय देश के मौजूदा रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने भी यहां शिरकत की थी।
उन्होंने कहा कि केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा 1984 के मामलों की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया, जिससे बंद हो चुके कई मामले दोबारा खुले और सज्जन कुमार जैसे आरोपियों को कानून के कटघरे में लाया गया। उन्होंने कहा कि सिख कौम ऐसे प्रयासों को कभी नहीं भूल सकती।
सरदार कालका ने कहा कि वह वह समय भी नहीं भूल सकते जब 1984 के पीड़ित परिवारों में से बीबी जगदीश कौर और जगशीर सिंह सहित उन्हें प्रधानमंत्री द्वारा अपने कार्यालय में बुलाया गया था। उस समय दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार मनजीत सिंह जी.के. और महासचिव सरदार मनजिंदर सिंह सिरसा भी मौजूद थे और प्रधानमंत्री ने पीड़ितों से पूछा था कि एसआईटी के गठन के बाद केंद्र सरकार द्वारा और क्या किया जा सकता है।
इसके विपरीत आज उसी भाजपा के तीन सांसदों का सज्जन कुमार की शोक सभा में जाना बेहद दुखद और सिख भावनाओं के लिए अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को स्पष्ट करना चाहिए कि ये सांसद पार्टी की नीति के तहत वहां गए थे या यह उनका निजी फैसला था।
सरदार जगदीप सिंह काहलों ने कहा कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इस मामले पर तुरंत अपना फर्ज निभाते हुए पूरी दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी टीम की बैठक की और कमेटी के किसी भी सदस्य ने इस कार्रवाई का समर्थन नहीं किया, बल्कि सर्वसम्मति से इसकी निंदा की।
उन्होंने कहा कि सरदार मनजीत सिंह जी.के. द्वारा सोशल मीडिया पर जारी की गई वीडियो में भाजपा के सांसदों की कार्रवाई की बजाय दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को निशाना बनाने का प्रयास किया गया है। उन्होंने सवाल किया कि जो लोग कल तक भाजपा और इसके नेताओं को सिख कौम का विरोधी बताते थे, आज उनका रुख अचानक क्यों बदल गया है?
सरदार काहलों ने कहा कि जब दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन के दौरान पंजाब और देश भर की सिख संगत किसानों की सेवा में लगी हुई थी, उस समय भी कुछ लोगों द्वारा भाजपा के साथ नजदीकियां बनाने की कोशिश की गई थी। उन्होंने कहा कि सिख कौम की पीठ पीछे खड़े होकर राजनीतिक सौदेबाजी करने वालों को आज संगत के सवालों का जवाब देना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी किसी राजनीतिक पार्टी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि दिल्ली की संगत की सेवा और सिख कौम के मुद्दों की पहरेदारी के लिए बनाई गई धार्मिक संस्था है। दोनों नेताओं ने कहा कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की हमारी पहली और आखिरी जिम्मेदारी दिल्ली की संगत और पंथ के प्रति है।
सरदार काहलों ने शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के बीच दोबारा संभावित गठबंधन की चर्चाओं पर भी तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि शिरोमणि अकाली दल सिखों की एक ऐतिहासिक और सिरमौर संस्था रही है और इसे किसी अन्य पार्टी के अधीन करके या राजनीतिक समझौतों के लिए इसकी वैचारिक पहचान को कमजोर करना पुराने अकाली कार्यकर्ताओं के लिए कभी भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि जो लोग कल तक बंदी सिंहों, 1984 के पीड़ितों और सिख कौम के अधिकारों की बात करते थे, उन्हें आज अपने बदले हुए रुख के बारे में सिख संगत को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।









