‘सृष्टि दी चादर’ संगोष्ठी में धार्मिक स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और सर्व-साझेदारी का संदेश गूंजा
नई दिल्ली, 26 अक्टूबर (मनमोहन सिंह) श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की शहादत केवल इतिहास की एक महान घटना नहीं, बल्कि मनुष्य की आस्था, अंतरात्मा की स्वतंत्रता और मान-सम्मान की रक्षा के लिए शाश्वत प्रेरणा है। गुरु साहिब ने दूसरों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपना शीश अर्पित करके संसार को यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल अपनी आस्था का सम्मान करना ही नहीं, बल्कि दूसरों के विश्वास का आदर करना भी है। ये विचार दिल्ली सरकार के मंत्री सरदार मनजिंदर सिंह सिरसा ने ‘सृष्टि दी चादर’ अकादमिक एवं अंतरधार्मिक संगोष्ठी को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
नौवीं पातशाही श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की अद्वितीय शहादत के 350वें वर्ष को समर्पित यह संगोष्ठी कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आई.एच.ए. फाउंडेशन द्वारा इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स (आई.जी.एन.सी.ए.) तथा दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सहयोग से आयोजित की गई। इस अवसर पर विभिन्न धर्मों के धर्मगुरुओं, प्रख्यात विद्वानों और सामाजिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों ने गुरु साहिब को श्रद्धा एवं सम्मान अर्पित करते हुए उनकी शहादत में निहित मानवतावादी संदेश पर अपने विचार साझा किए।
सरदार मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि किसी अन्य व्यक्ति की आस्था और अंतरात्मा की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए खड़ा होना मानवता का मूलभूत कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि गुरु साहिब का जीवन हमें दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने, अन्याय के सामने निर्भीक रहने और सत्य के पक्ष में दृढ़ता से खड़े होने की प्रेरणा देता है। उनकी शहादत का प्रकाश धार्मिक और भौगोलिक सीमाओं से परे समूची मानवता का मार्गदर्शन करता है।
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार हरमीत सिंह कालका और महासचिव सरदार जगदीप सिंह काहलों ने कहा कि गुरु साहिब का महान बलिदान सिख इतिहास का गौरवशाली अध्याय होने के साथ-साथ समूचे विश्व के लिए स्वतंत्रता, समानता और मानवाधिकारों की रक्षा का सार्वभौमिक संदेश है। उन्होंने कहा कि इस महान विरासत के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रदर्शन आपसी सम्मान, कमजोर और वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा तथा निःस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करने के माध्यम से होना चाहिए।
संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने गुरु साहिब की शहादत को अंतरात्मा की स्वतंत्रता का अद्वितीय उदाहरण बताते हुए कहा कि अपने से भिन्न धार्मिक विश्वास रखने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देना सर्व-साझेदारी और सार्वभौमिक भाईचारे की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता केवल अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने का अधिकार नहीं है, बल्कि दूसरों को भी उसी स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने देने की साझा जिम्मेदारी है।
इस अवसर पर आई.एच.ए. फाउंडेशन के अध्यक्ष सरदार सतनाम सिंह आहलूवालिया और मुख्य सलाहकार सरदार परमजीत सिंह चंडोक सहित कई प्रमुख हस्तियां उपस्थित थीं। ज्ञानी हरमन सिंह खालसा, डॉ. इमाम उमर अहमद इलियासी, आचार्य डॉ. लोकेश मुनि, गोस्वामी सुशील जी महाराज और मौलाना ए.आर. शाहीन कासमी सहित सिख, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, जैन और पारसी समुदायों के प्रतिनिधियों की भागीदारी ने इस आयोजन को अंतरधार्मिक संवाद और पारस्परिक सम्मान का साझा मंच बना दिया।







